मजदूरों के लिए दिल्ली यूनिवर्सिटी के प्रोफेसरों की भूख हड़ताल

नई दिल्ली. भारत में इस समय कोरोना वायरस संक्रमण और लॉकडाउन दो बहुत बड़े मुद्दे बने हुए है. इसके अलावा एक अन्य मुद्दा है माइग्रेंट मजदूरों को उनके घर पहुंचाने का. दूसरे राज्यों में फंसे हुए मजदूर अपने घर जाने के लिए बेताब हैं. लॉकडाउन के शुरूआत में देखा गया था कि अपने घर जाने के लिए भूखे प्यास लगातार हजारों किलोमीटर की यात्रा भी मजदूरों ने तय की थी.

वहीं देश के अलग अलग हिस्सों में जहां हजारों मजदूर आज भी फंसे हुए हैं. उनके समर्थन में आज दिल्ली विश्ववद्यालय के शिक्षकों ने उपवास रखा. शिक्षकों का मानना है कि करोड़ों मजदूर इतनी गर्मी में घंटों सड़कों पर लाइन में खड़े होकर अपने खाने पीने का इंतजाम कर रहे हैं.

संकट के इस समय में हजारों मजदूरों की जान जा रही है. सरकार की कोशिशें भी कई बार हर मजदूर तक पहुंचने में देर कर देती है. लॉकडाउन के पहले दिन से मजदूरों के पलायन का सिलसिला जो शुरू हुआ है वो अबतक बादस्तूर जारी है. मजदूर सब कुछ दांव पर रखकर अपने घर, अपने गांव पहुंचने की जुगत में लगे हुए हैं.

अकादमिक काउंसिल के सदस्य और डूटा के पूर्व उपाध्यक्ष सुधांशु कुमार ने बताया कि मजदूरों के समर्थन में आज डीयू के शिक्षकों में बुद्ध पूर्णिमा के मौके पर सुबह 7 बजे से शाम 7 बजे तक उपवास किया. इसके जरिए मजदूरों के हक और न्याय के लिए उपवास भी किया. इस मुहिम में डीयू के साथ जेएनयू, बी.एच.यू., पुड्डुचेरी, उत्तराखंड यूनिवर्सिटी, बिहार यूनिवर्सिटी, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, आदि राज्यों से भी प्रोफेसर, शोधार्थी और छात्र शामिल हुए.

शिक्षकों ने मांग की कि मजदूरों को घर पहुंचाने के लिए ट्रेन-बसों से जो यात्रा करवाई जा रही है उसका मजदूरों से कोई किराया न वसूला जाए. वहीं जो मजदूर अपने कार्यस्थल पर रहना चाहते हैं उनके लिए सरकार और प्रशासन भोजन और रहने का प्रबंध करे. जबतक मजदूरों को कोई रोजगार नहीं मिल जाता तब तक उनके खाते में हर महीनें न्यूनतम वेतन के बराबर पैसा डाला जाए.

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